अक्षय्य तृतीया

व्रत का नाम : अक्षय्य तृतीया
व्रत तिथी : वैशाख शुद्ध तृतीया

वैशाख शुक्लपक्षेतु तृतीया रोहिणीयुता | पूर्वाण्ह व्यापिनी ग्राह्या परायदि दिनद्वये ||
दुर्लभा बुधवारेण सोमेनापि युतातथा | रोहिणी बुधयुक्तापि पूर्वविद्धा विवर्जिता ||

अर्थात,

  • वैशाख शुद्ध तृतीया को किया हुआ दान अक्षय्य रहता है इसलिए इस तृतीया को ‘अक्षय्य तृतीया’ कहते है |
  • इस दिन सोमवार / बुधवार तथा रोहिणी नक्षत्र हो, तो यह पुण्यकारक योग माना जाता है |
  • यह पारंपारिक साडे तीन मुहूर्तोंमें से एक माना जाता है |

कौन करे यह व्रत ?

जीवन में अक्षय्य सुख और कल्याण की अपेक्षा सभी को होती है | अतः घर के प्रत्येक सदस्य ने इस दिन कुम्भ पूजन करना चाहिए | इसका सम्बन्ध केवल पितृश्राद्ध आदि विधियों से ही है, ऐसा नहीं |

विधी

  • इस दिन देवता एवं पितरो के लिए (एक या दो) मिट्टी के कुम्भ में जल, सुगन्धित द्रव्य आदि डाले |
  • शुचिर्भुत होते हुए आचमन, प्राणायाम आदि के उपरांत इस प्रकार संकल्प करे:

श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं, श्रीवसन्तमाधवदेवताप्रीत्यर्थं पितृप्रीत्यर्थं च उदकुम्भ दानं अहं करिष्ये ||

  • कुम्भ को सूतवेष्टन करते हुए देवकार्य सम्बन्ध से सभी सदस्य कुम्भ की गंध, पुष्प द्वारा तथा सुपारी-सिक्का आदि डालते हुए उस में अक्षत रूपी गेहूँ डाले |
  • अनंतर पुरोहित का पूजन करते हुए इस मंत्र से उदककुंभदान करे,

एष धर्म घटो दत्तो ब्रह्माविष्णू शिवात्मक : | अस्यप्रदानात्सकला मम संतु मनोरथा : ||

  • पितृ तृप्ति हेतु से, जिनके माता-पिता ना हो, वे प्रथम गेहूँ और बाद में काले तील कुम्भ में अर्पण करे | 
  • अनंतर इस मंत्र से उदककुंभदान करे,

एष धर्म घटो दत्तो ब्रह्माविष्णू शिवात्मक : | अस्य प्रदानात् तृप्यंतु पितरोsपि पितामहा : ||
गंधोदक तिलैर्मिश्रं सान्नंकुंभं फलान्वितम् | पितृभ्य: संप्रदास्यामि अक्षय्य मुपतिष्ठतु ||

  • अपने कुलाचार अनुरूप भोग समर्पित करे |
  • सामान्यतः शेवई, पापड, कुरडई, चिंचोणी, पन्ह आदि पक्वान्नो का भोग समर्पित किया हुआ दिखाई देता है |
  • पुरोहित को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा इस दिन दान करे |
  • सामान्यतः सत्तु-गूड, खरबूज, आम आदि का दान किया जाता है |
  • इस दिना किया हुआ जप, होम, तर्पण, दान इ. अक्षय्य होता है |

महत्व

  • कृषि बंधु इस मंगल दिन कृषि कार्य को प्रारम्भ करते है |
  • कुछ जगह चैत्र शुक्ल तृतीया को चैत्रागौरी का आवाहन किया जाता है तथा इस दिन इस व्रत की समाप्ति की जाती है |
  • इस शुभ मुहुर्त पर किया गया कार्य यह ‘अक्षय्य’ अर्थात अखंड / निरंतर चलता है तथा इसका अक्षय्य फल प्राप्त होता है |

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

  • इस दिन श्रीविष्णु के अवतार, भगवान श्रीपरशुरामजी अवतरित हुए इसलिए भी इस तृतीया को विशेष महत्त्व है |
  • भविष्यपुराण के अनुसार इस तिथि को ‘युगादी तिथी’ (सत्ययुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि) भी कहा जाता है|

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